ओलंपिक में पदकों की कमी वाले देश का कोई खिलाड़ी अगर स्वर्ण पदक जीत ले, तो निश्चित है कि पूरे देश का ध्यान सोने की उस चमक में ही खो जाएगा. लेकिन भाला फेंक प्रतियोगिता के स्वर्ण विजेता नीरज चोपड़ा ने हिंदी को लेकर एक चमकदार बात भी कही है. उन्होंने हिंदी के लिए जो गर्व बोध दिखाया है, उसकी ओर भी हिंदीभाषियों का ध्यान जरूर जाना चाहिए. हम आजादी के पचहत्तरवें साल में प्रवेश कर चुके हैं. अव्वल तो इतने बरसों में हमारा भावपक्ष इस हद तक भारतीय हो जाना चाहिए था कि सार्वजनिक स्थानों पर अपनी भाषाएं बोलने में हमें कोई हिचक या शर्म नहीं हो. लेकिन दुर्भाग्यवश अब तक ऐसा नहीं हो पाया है.

अंग्रेजी का असर इतना है कि भारत भूमि में बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल करने वाली हस्ती भी सफलता के बाद अंग्रेजी बोलने को मजबूर हो जाती है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारतीय खिलाड़ियों पर भी अंग्रेजी बोलने और नहीं बोल पाने की स्थिति में उसे सीखने का दबाव होता है. यहां माना जाता है कि अंग्रेजी की जानकारी और उसे बोलना अंतरराष्ट्रीय मान्यता और कामयाबी की निशानी है. आजादी के बाद से ही राजनीति, प्रशासन और कारोबार में अंग्रेजी बोलने-जानने वालों को मिलती रही तरजीह ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है. इसलिए जो लोग अंग्रेजी नहीं बोल पाते, वे खुद को हीन मानने लगते हैं.

ऐसे माहौल में अगर नीरज चोपड़ा ने हिंदी की तरफदारी की है, तो इसे उनकी दिलेरी मानी जानी चाहिए और इसका स्वागत होना चाहिए. दरअसल 2019 के इंडियन स्पोर्ट्स अवार्ड समारोह में नीरज चोपड़ा भी शामिल थे. तब उस कार्यक्रम की एंकरिंग कर रहे जतिन सप्रू ने उनसे अंग्रेजी में सवाल पूछना शुरू किया, तो नीरज ने उनसे बेधड़क हिंदी में सवाल पूछने को कह दिया था. यह सोचे-समझे बगैर कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित हो रहे एक नामी टीवी चैनल पर वह बोल रहे हैं. नीरज की यह दिलेरी ही है कि उन्होंने उस कार्यक्रम में मौजूद अंग्रेजी दां दुनिया के दिग्गजों के बीच ऐसा कहने में हिचक नहीं दिखाई.

नीरज के इस हिंदी प्रेम की तब चर्चा नहीं हुई थी. वैसे भी बड़ी सफलता का टैग आपके पीछे न लगा हो, तो आप पर दुनिया का ध्यान नहीं जात. पर अब नीरज की दुनिया बदल चुकी है. अब नीरज खुद भारतीय खेल जगत के सुनहरे सितारे बन गए हैं. इसलिए उनकी हर बात अब गौर से सुनी जाएगी. हिंदी की रोटी खाने के बावजूद भारतीय मीडिया के एक वर्ग को हिंदी की दुनिया डाउनमार्केट लगती है. चूंकि नीरज अब अपमार्केट हैं, इसलिए उनके विचार भी अपमार्केट जैसा प्रभाव डालेंगे. शायद यही वजह है कि उनसे उस वाकये के बारे में पूछा भी जा रहा है. ऐसे ही एक सवाल के जवाब में उन्होंने जो कहा, उससे उनके साहस का ही परिचय मिलता है. नीरज ने कहा, ‘हां, सही है कि मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं है, तो मैंने बोला था कि हिंदी में बात कर लेते हैं. मुझे लगता है कि हिंदी को सपोर्ट करना चाहिए.

इसी इंटरव्यू में नीरज चोपड़ा ने न सिर्फ हिंदी वालों को संदेश दिया, बल्कि भारतीयों को सुझाव भी दे दिया। उन्होंने कहा, ‘हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से ग्रस्त नहीं होना चाहिए. हिंदुस्तान से हैं, तो सबको हिंदी बोलनी चाहिए. अंग्रेजी भी आनी चाहिए, ऐसे नहीं बोलना चाहिए कि मत सीखो, वह भी सीखो, लेकिन हिंदी बोलना चाहिए और उसमें भी प्राउड फील करो. दूसरे देश के कई बड़े खिलाड़ियों में बहुत कम ऐसे हैं, जिन्हें अच्छी अंग्रेजी आती है. वे अपनी ही भाषा में बोलते हैं. अपनी भाषा में हमें भी गर्व महसूस होना चाहिए.

नीरज चोपड़ा चूंकि विजेता हैं और संसार विजेताओं का सम्मान करता है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी को लेकर कही उनकी बात उन युवाओं में उत्साह का संचार करेगी, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती और वे इस वजह से हीन भावना से भरे रहते हैं. नीरज की इसलिए भी तारीफ होनी चाहिए कि वह कम से कम अब तक अंग्रेजी दां बनने की राह पर चलते नहीं दिख रहे हैं.